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आखिर क्यों ? पीरियड्स को भारत मे गन्दा और अपवित्र समझा जाता है... आप भी जाने!

मासिक चक्र जिसे अंग्रजी में Menstrual Periods कहा जाता है, जिसे लेकर भारतीय समाज में कई प्रकार की अवधारणाएं हैं, समाज मे इसे कभी सामान्य तरीके से प्रस्तुत नही करता है, लेकिन इसे लेकर अब  समाज परिवर्तन की और बढ़ रहा है।
यह एक महिलाओं मे होने  वाला आंतरिक मासिक परिवर्तन है इस मासिक परिवर्तन का वैज्ञानिक दृष्‍टिकोण बहुत ही सीधा और सुलझा हुआ है, परन्तु आध्‍यात्‍मिक एवं धार्मिक और तरह से कर्मकांड की अलग-अलग तरह की मान्‍यताएं एवं अवधारणायें हैं।




इसे लेकर विवाद भी उत्पन्न हुआ था केरल में, वहां महिलाओं की माहवारी के समय उन्‍हें मंदिर में प्रवेश नहीं दिए जाने और प्रवेश से पहले शुद्धता जांचने का फरमान जारी किया गया था। मंदिर के अध्‍यक्ष के इस बयान से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर, और निचले स्‍तर पर बहस शुरू हुई थी।

पूरा मामला ये था : हाल ही में त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन के महिला विरोधीबयान ने सोशल मीडिया पर एक बहस शुरू हुई और देश के युवाओं से गोपालकृष्णन को इसका जवाब भी मिला। कुछ ही दिनों पहले बोर्ड के अध्यक्ष नियुक्त हुए गोपालकृष्णन के बयान ने उस वक्त सुर्खियां भी बटोरी, उन्होंने कहा था कि महिलाओं को प्रसिद्ध साबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति तभी दी जाएगी जब उनकी शुद्धता की जांच करने वाली मशीन का आविष्कार हो जाएगा।


गोपालकृष्णन के इस बयान का मतलब का था कि महिलाओं को तभी मंदिर में आने दिया जाएगा जब ऐसी मशीनें आ जाएंगी जो ये जाँच करें कि महिलाओं को मासिक धर्म चल रहा है या नहीं। जिसके बाद से सोशल मीडिया पर हैप्पी टू ब्लीडके साथ एक मुहिम शुरू हुई थी और लोगों ने समाज में मासिक धर्म को लेकर फैले हुए अंधविश्वास के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उस दौरान लड़कियों ने हाथ में पेड्स, नैपकिन लेकर फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गये और लोगों को जागरूक करने की कोशिश की गई।

पवित्रता और अपवित्रता के बारे में कुछ यूँ फैला है अंधविश्‍वास : खास बात यह है कि हमारे देश में गोपाल कृष्णन ही नहीं बल्कि भारतीय समाज का एक बड़ा तबका तो यही मानता हैं कि महिलाओं में होने वाली माहवारी की प्रक्रिया अपवित्रता है। अपवित्रताका आलम ये है कि इस दौरान महिलाओं को कई मान्यताओं से गुजरना पड़ता है, वो रसोई घर में नहीं जा सकती, वे खाना नहीं बना सकती, पूजा घर में प्रवेश नहीं कर सकती। कई इलाकों पर महिलाओं को पुरुष के पास भी नहीं सोने दिया जाता। हालात तो यूँ है की देश के ग्रामीण इलाके ही नही शहरी इलाके भी इस धरना से ग्रस्त है।


देश में पढ़ी लिखी महिलायें  मासिक स्त्राव के बारे में जानती हैं तो वो भी वें नेपकिन का इस्तेमाल नहीं करती, क्योंकि उनको डर रहता है कि वो दुकानदार से कैसे नैपकिन मांगेगी और कैसे लेकर आएंगी। सर्वे के अनुसार देश की लगभग 70 से 75 फीसदी महिलाओं की तो सेनेटरी उत्पादों तक पहुंच ही नहीं है इसलिए वो सूती कपड़ा, राख, झाड़ आदि चीजों का उपयोग  करती हैं, अत: उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है। आज शहरों में भी जहां पेड्स या नैपकिन को काली थैली, अखबार या किसी पेपर में लपेटकर दिया जाता है, ताकि कोई देख ना पाए।

शिशु मृत्‍यु दर बढने का कारण : आज स्थिति ये है कि माहवारी को लेकर हो रही झिझक से भी देश में हर साल मातृ-शिशु मृत्यु दर बढ़ रही है, कारण ये है की रिप्रोडक्टिव हेल्थ को लेकर अज्ञानता विध्यमान है। ग्रामीण क्षेत्रों की  बात की जाये तो पता चलता है कि पीढ़ी दर पीढ़ी ये अज्ञानता आगे बढती जा रही है। महिलाओं को ही अपने शरीर के बारे में ही आधी-अधूरी  जानकारी होती हैतो  संक्रमण और बीमारियां भी फैलती है। हालांकि देश में कई उदाहरण ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने कई बार अलग-अलग तरीकों से देश की महिलाओं का जागरूक करने का काम किया है, जिसमें द कचरा प्रोजेक्टका नाम सबसे ऊपर आता है। कुछ समय पहले  में लन्दन में आयोजित हुए लन्दन मैराथनकी दौड़ में किरण गांधीनाम की एक भारतीय महिला ने पीरियड्स होने के बावजूद भी दौड़ में भाग लिया और खून आने के बाद भी दौड़  बिच मे नहीं छोड़ी, ताकि महिलाओं में मासिक धर्म को लेकर जागरूकता फैल सके।

समझिये विज्ञान से ये है माहवारी का वैज्ञानिक कारण : दरअसल, शरीर से मासिक रक्तस्राव होना सामान्य प्रक्रिया  है। यह गर्भाशय की परत के टूटने के कारण होता है। मासिक धर्म, शरीर के गर्भावस्था के लिए तैयार होने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण  हिस्सा है, न की शरीर से गन्दा या दूषित रक्त का निकालना। मासिक धर्म के बारे में कुछ भी गन्दा नहीं होता है। वहीं इस दौरान ऐसा हो सकता है कि बहुत खून निकल रहा है, पर ऐसा होता नहीं है। ज्यादातर महिलाओं में एक बार के मासिक रक्तस्राव में 2 से 6 चम्मच तक रक्त निकलता है। बाकी जो दिखता है वह गर्भाशय (यूट्रस) की परत के ऊतक होते हैं। वहीं किसी लड़की का मासिक धर्म सामान्य होने में कुछ साल लग सकते हैं। ऐसे में मासिक धर्म का न होना सामान्य हो सकता है।



वैसे 9 से 12 साल की लड़कियों को, जिनका पहला मासिक-धर्म शुरू होने वाला है, उन्हें जो जानना जरूरी है अगर उसे सरल शब्दों में समझाया जाए, तो वे समझ जाएंगी। जैसे, माहवारी कितने हफ्तों के बाद आती है, कितने दिनों तक चलती है, और इसमें कितना खून निकलता है। इसलिए मासिक-धर्म के बारे में पहली बार बताते वक्‍त अच्छा होगा अगर आप सिर्फ जरूरी बातों पर ध्यान दें और इसका सामना करने के बारे में कारगर सुझाव दें। इसके अलावा, शायद आपको इस तरह के सवालों का जवाब देना पड़े: मासिक-धर्म के दौरान मुझे कैसा महसूस होगा? या इस दौरान क्या-क्या होगा?

आप चाहे तो बाद में बारीकी से समझा सकते हैं कि मासिक-धर्म के वक्‍त शरीर में क्या-क्या होता है। अक्‍सर इस बारे में कोई किताब या पत्रिका,आपको डॉक्टरों, या किसी लाइब्रेरी या पुस्तकों की दुकान से मिल सकती है। मासिक-धर्म के बारे में बारीकी से समझाने के लिए यह किताब या पत्रिका काफी मददगार साबित हो सकती है।





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